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अंक 004

स्वस्थ किसे कहते हैं? आयुर्वेद की स्वास्थ्य परिभाषा और 6 कसौटियाँ

✍ नाड़ी वैद्य डॉ. अजीत सिंह यादव · 📅 29 October 2026

🌿 आयुर्वेद ज्ञानमाला — नाड़ी वैद्य के संग | अंक 004

सिर्फ़ रोग न होना स्वास्थ्य नहीं — सुश्रुत की छह कसौटियाँ

लेखक: नाड़ी वैद्य डॉ. अजीत सिंह यादव (BAMS) • सह-लेखक: नाड़ी वैद्य डॉ. सलोनी यादव वशिष्ठ (BAMS, MD (DN)), नाड़ी वैद्य डॉ. मोहित वशिष्ठ (BAMS, MD (AM))
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स्वस्थ किसे कहते हैं — आयुर्वेद की स्वास्थ्य परिभाषा, नाड़ी वैद्य गुरुकुल
अंक 004

स्वस्थ किसे कहते हैं?

दोष • अग्नि • धातु • मल • प्रसन्न मन

स्वस्थ किसे कहते हैं? आयुर्वेद के अनुसार स्वस्थ वह है जिसके दोष, अग्नि, धातुएँ और मल-क्रियाएँ संतुलित हों, और जिसकी आत्मा, इन्द्रियाँ और मन प्रसन्न हों। यानी केवल रोग का न होना स्वास्थ्य नहीं — शरीर का ठीक चलना और मन का प्रसन्न रहना, दोनों मिलकर स्वास्थ्य बनाते हैं।

अगर आपकी सारी रिपोर्ट “नॉर्मल” हैं, पर भूख नहीं लगती, नींद टूटती है और मन उदास रहता है — तो क्या आप स्वस्थ हैं? और अगर कोई कहे “मुझे कोई बीमारी नहीं”, तो क्या इतना काफ़ी है?

हमारे घरों में बड़े-बुज़ुर्ग हालचाल पूछते थे — “भूख ठीक लगती है? नींद आती है? पेट साफ़ रहता है? मन तो प्रसन्न है?” ये साधारण सवाल असल में आयुर्वेद की स्वास्थ्य परिभाषा ही हैं, जो पीढ़ियों से घर-घर में जीवित रही।

अंक 001 में हमने पढ़ा कि आयुर्वेद का पहला उद्देश्य है स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा। पर रक्षा उसी की हो सकती है जिसे पहचाना जा सके। आज समझते हैं — आयुर्वेद “स्वस्थ” किसे मानता है।

🌿 आज का स्वास्थ्य सूत्र

“स्वास्थ्य केवल रोग का अभाव नहीं — शरीर, अग्नि और मन का संतुलन है।”

आयुर्वेद के प्रमुख ग्रंथ सुश्रुत संहिता में स्वस्थ व्यक्ति की यह प्रसिद्ध परिभाषा दी गई है —

“समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः।
प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते॥”

भावार्थ: जिसके दोष सम हों, अग्नि सम हो, धातुएँ और मल की क्रियाएँ सम हों, और जिसकी आत्मा, इन्द्रियाँ तथा मन प्रसन्न हों — वही स्वस्थ कहलाता है। (सुश्रुत संहिता, सूत्रस्थान 15)

ध्यान दीजिए — इस परिभाषा का आधा भाग शरीर के बारे में है और आधा मन व चेतना के बारे में। लगभग दो हज़ार वर्ष पहले ही आयुर्वेद ने स्वास्थ्य को शरीर और मन की संयुक्त अवस्था माना।

1. “स्वस्थ” शब्द का अर्थ

“स्वस्थ” शब्द बना है स्व + स्थ से — यानी “जो अपने में स्थित हो।” अपनी प्रकृति में, अपने स्वभाव में, अपने संतुलन में टिका हुआ व्यक्ति स्वस्थ है।

इसका एक सुंदर अर्थ यह भी है कि स्वास्थ्य हर व्यक्ति के लिए एक-सा नहीं होता। दुबले-फुर्तीले वात प्रकृति वाले व्यक्ति का स्वास्थ्य, भारी-स्थिर कफ प्रकृति वाले व्यक्ति के स्वास्थ्य जैसा नहीं दिखेगा — फिर भी दोनों अपनी-अपनी प्रकृति में स्वस्थ हो सकते हैं।

2. सुश्रुत की छह कसौटियाँ — सरल भाषा में

कसौटी अर्थ रोज़ के संकेत
⚖️ समदोष वात, पित्त, कफ अपनी प्रकृति के अनुसार संतुलन में शरीर हल्का, जोड़ों-पेट में अनावश्यक भारीपन, जलन या रूखापन नहीं
🔥 समाग्नि पाचन की अग्नि न बहुत तेज़, न बहुत मंद समय पर भूख, भोजन के बाद भारीपन, खट्टी डकार या गैस नहीं
🧬 समधातु रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र — सातों धातुओं का उचित पोषण उम्र के अनुसार ताक़त, स्थिर वज़न, त्वचा-बालों में चमक
🚿 सम मलक्रिया मल, मूत्र और पसीने का ठीक से निकलना रोज़ नियमित और साफ़ पेट, पेशाब-पसीने में असामान्यता नहीं
👁️ प्रसन्न इन्द्रियाँ आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा — सब अपने काम में सक्षम स्वाद अच्छा लगना, ठीक दिखना-सुनना, इन्द्रियों में थकान नहीं
😊 प्रसन्न आत्मा व मन मन शांत, उत्साह और संतोष बना रहे गहरी नींद, काम में रुचि, बात-बात पर चिड़चिड़ापन या उदासी नहीं

ये संकेत समझने के लिए सामान्य मार्गदर्शक हैं — किसी रोग की पहचान या इलाज का आधार नहीं।

3. अग्नि — स्वास्थ्य की धुरी

आयुर्वेद में अग्नि को स्वास्थ्य का केंद्र माना गया है। जो खाया, वह ठीक पचा तो धातुओं को पोषण मिलेगा; ठीक नहीं पचा तो शरीर में “आम” (अधपचा, भारी पदार्थ) बनने की संभावना बढ़ती है, जिसे आयुर्वेद अनेक समस्याओं की जड़ मानता है।

अग्नि की चार अवस्थाएँ बताई जाती हैं — सम (संतुलित), विषम (कभी तेज़ कभी मंद — प्रायः वात से), तीक्ष्ण (बहुत तेज़ — प्रायः पित्त से) और मंद (धीमी — प्रायः कफ से)। स्वस्थ व्यक्ति की पहचान है — समाग्नि।

इसीलिए आयुर्वेद में स्वास्थ्य का पहला सवाल अक्सर यही होता है — “भूख कैसी है?”

4. प्रसन्न आत्मा, इन्द्रियाँ और मन

परिभाषा का अंतिम भाग सबसे गहरा है। शरीर की सारी क्रियाएँ ठीक हों, पर मन लगातार भय, क्रोध, चिंता या उदासी में रहे — तो आयुर्वेद उसे पूर्ण स्वस्थ नहीं मानता।

आयुर्वेद मन के तीन गुण बताता है — सत्व, रज और तम (इस पर एक पूरा अंक आगे आएगा)। सत्व की वृद्धि — यानी स्पष्टता, शांति और संतोष — मन के स्वास्थ्य का लक्षण माना गया है। सही समय पर सोना-जागना (अंक 003: ब्राह्म मुहूर्त), सात्त्विक भोजन, अच्छी संगति और प्रार्थना-ध्यान को इसके सहायक बताया गया है।

स्वास्थ्य सूत्र

“पेट ठीक, नींद गहरी, मन प्रसन्न — यही घर का स्वास्थ्य-मापक है।”

5. आधुनिक विज्ञान क्या कहता है?

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के संविधान (1948) में स्वास्थ्य की परिभाषा है — “स्वास्थ्य केवल रोग या दुर्बलता का अभाव नहीं, बल्कि पूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कल्याण की अवस्था है।” यानी आधुनिक दृष्टि भी स्वास्थ्य को केवल “बीमारी नहीं है” से बड़ा मानती है।

आज का विज्ञान नींद, पाचन, मानसिक स्वास्थ्य और शारीरिक सक्रियता को एक-दूसरे से जुड़ा हुआ मानता है — जैसे पूरी नींद न मिलने पर भूख, मनोदशा और ऊर्जा, सब प्रभावित हो सकते हैं।

पर एक बात आधुनिक विज्ञान विशेष रूप से याद दिलाता है — हर अच्छा महसूस करने वाला व्यक्ति पूरी तरह स्वस्थ हो, यह ज़रूरी नहीं। ब्लड प्रेशर, शुगर, कोलेस्ट्रॉल या खून की कमी जैसी कई स्थितियाँ शुरुआत में बिना लक्षण के होती हैं। इसलिए डॉक्टर की सलाह के अनुसार नियमित जाँच भी स्वास्थ्य-रक्षा का हिस्सा है।

6. सात प्रकृतियों में “सम” का अर्थ

“समदोष” का अर्थ यह नहीं कि तीनों दोष तराज़ू की तरह बराबर हों। अर्थ है — अपनी जन्मजात प्रकृति के अनुसार संतुलन। हर प्रकृति में स्वास्थ्य कुछ अलग दिखता है —

प्रकृति स्वस्थ अवस्था में असंतुलन के आरंभिक संकेत
🌬️ वात फुर्ती, रचनात्मकता, तेज़ समझ रूखापन, गैस-कब्ज़, बेचैनी, टूटी नींद
🔥 पित्त तेज़ पाचन, स्पष्ट बुद्धि, नेतृत्व जलन, एसिडिटी, ज़्यादा गुस्सा, ज़्यादा पसीना
🌿 कफ स्थिरता, सहनशक्ति, शांत स्वभाव भारीपन, सुस्ती, ज़्यादा नींद, बलगम
🌬️🔥 वात-पित्त ऊर्जा और तीक्ष्णता का मेल बेचैनी के साथ जलन, अनियमित भूख
🔥🌿 पित्त-कफ मज़बूत शरीर, अच्छा पाचन भारीपन के साथ एसिडिटी, वज़न बढ़ना
🌬️🌿 वात-कफ शांत पर कोमल स्वभाव ठंड लगना, मंद भूख, जकड़न
🌬️🔥🌿 सम प्रकृति सब में संतुलन — दुर्लभ और श्रेष्ठ मानी गई ऋतु या दिनचर्या बिगड़ने पर कोई भी दोष

ये सामान्य आयुर्वेदिक मार्गदर्शक हैं। अपनी प्रकृति स्वयं तय न करें — इसके लिए योग्य नाड़ी वैद्य से परामर्श लें। किसी रोग या दवा की स्थिति में वास्तविक स्वास्थ्य-स्थिति प्रकृति से अधिक महत्वपूर्ण है।

7. किन बातों को “सामान्य” समझकर अनदेखा न करें?

कई लोग कुछ परेशानियों को उम्र या थकान मानकर टालते रहते हैं। नीचे के लक्षण हों तो देर न करें, डॉक्टर से जाँच करवाएँ —

  • बिना कारण वज़न का तेज़ी से घटना या बढ़ना
  • लगातार थकान, साँस फूलना या सीने में दर्द/भारीपन
  • बहुत प्यास, बार-बार पेशाब, या घाव का देर से भरना
  • लंबे समय तक भूख न लगना, मल में ख़ून या मल की आदत में अचानक बदलाव
  • हफ़्तों तक उदासी, नींद न आना या किसी काम में मन न लगना

आयुर्वेद का स्वस्थ-रक्षण और आधुनिक जाँच एक-दूसरे के विरोधी नहीं — दोनों मिलकर पूरी तस्वीर देते हैं।

8. शरद से हेमंत — इस ऋतु में स्वास्थ्य-रक्षा

उत्तर भारत में अब शरद ऋतु से हेमंत की ओर बदलाव है। आयुर्वेद के अनुसार ठंड बढ़ने के साथ प्रायः अग्नि प्रबल होने लगती है, इसलिए यह समय पोषण और बल बढ़ाने के लिए अनुकूल माना गया है। पर ऋतु-संधि (दो ऋतुओं के बीच का समय) में शरीर को धीरे-धीरे ढालना ज़रूरी है।

  • भूख लगने पर ही भोजन करें; ताज़ा, गर्म और घर का बना भोजन लें
  • सुबह-शाम की ठंड से बचें — सिर, कान और पैर ढकें
  • दिन में पर्याप्त पानी पिएँ; ठंड में प्यास कम लगने पर भी
  • हल्का व्यायाम या सैर नियमित रखें; ठंडी सुबह में बुज़ुर्ग और हृदय/रक्तचाप वाले व्यक्ति चिकित्सक की सलाह से ही

🩺 9. नाड़ी परीक्षा और स्वास्थ्य की पहचान

नाड़ी वैद्य डॉ. अजीत सिंह यादव जी के 36 वर्षों से अधिक के क्लीनिकल अनुभव में नाड़ी परीक्षा का उद्देश्य केवल रोग ढूँढना नहीं, बल्कि व्यक्ति के संतुलन को समझना रहा है — दोषों की स्थिति, अग्नि, प्रकृति और मन की अवस्था। सुश्रुत की यही छह कसौटियाँ नाड़ी, जीभ, नींद, भूख और मल-मूत्र के प्रश्नों के साथ परखी जाती हैं (अंक 002: नाड़ी परीक्षा क्या है?)।

उनकी पद्धति में नाड़ी की गति • लय • बल • गहराई के साथ व्यक्ति के आहार-विहार और ऋतु का विचार किया जाता है, ताकि स्वस्थ व्यक्ति को अपनी प्रकृति के अनुसार स्वास्थ्य-रक्षा का मार्ग समझाया जा सके।

“नाड़ी को केवल छूना नहीं — नाड़ी से जुड़ना पड़ता है।”

इस परंपरा को दूसरी पीढ़ी के नाड़ी वैद्य डॉ. सलोनी यादव वशिष्ठ और नाड़ी वैद्य डॉ. मोहित वशिष्ठ आगे बढ़ा रहे हैं। नाड़ी वैद्य परिवार को फ़िल्म जगत, रॉयल फ़ैमिलीज़, प्रमुख बिज़नेस फ़ैमिलीज़ और अंतरराष्ट्रीय रोगियों के साथ परामर्श का अनुभव रहा है। नाड़ी वैद्य गुरुकुल से प्रशिक्षित नाड़ी वैद्य आज देश के लगभग हर राज्य में सेवा दे रहे हैं। यह विद्या सीखना चाहें तो देखें — नाड़ी परीक्षा कोर्स।

नाड़ी परीक्षा एक पारंपरिक आयुर्वेदिक समग्र मूल्यांकन पद्धति है; यह लैब टेस्ट या आधुनिक जाँचों का विकल्प नहीं है।

🏡 10. आज का Practical Experiment — सात दिन की स्वास्थ्य-डायरी

एक छोटी डायरी या मोबाइल नोट में रोज़ रात सोने से पहले छह सवालों के जवाब ✔️ या ✖️ में लिखें —

  • भूख: क्या समय पर स्वाभाविक भूख लगी?
  • पाचन: क्या भोजन के बाद पेट हल्का रहा — भारीपन, गैस या जलन नहीं?
  • मल: क्या सुबह पेट आराम से साफ़ हुआ?
  • नींद: क्या रात की नींद गहरी थी और सुबह ताज़गी लगी?
  • ऊर्जा: क्या दिन भर काम करने का उत्साह बना रहा?
  • मन: क्या मन अधिकतर शांत और प्रसन्न रहा?

सातवें दिन देखें — किस कसौटी पर सबसे ज़्यादा ✖️ आए। वही आपके स्वास्थ्य की पहली प्राथमिकता है। जैसे नींद में ✖️ ज़्यादा हों, तो पहले सोने का समय ठीक करें। अगर कोई परेशानी लगातार बनी रहे, तो अपनी डायरी लेकर योग्य वैद्य या डॉक्टर से मिलें।

पिछले अंक पढ़ें: अंक 003 — सुबह कितने बजे उठना चाहिए? • अंक 002 — नाड़ी परीक्षा क्या है? • अंक 001 — आयुर्वेद क्या है?

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

आयुर्वेद के अनुसार स्वस्थ किसे कहते हैं?
सुश्रुत संहिता के अनुसार जिस व्यक्ति के दोष (वात-पित्त-कफ) सम हों, अग्नि सम हो, धातुएँ और मल-क्रियाएँ सम हों, और जिसकी आत्मा, इन्द्रियाँ व मन प्रसन्न हों — उसे स्वस्थ कहते हैं। यानी स्वास्थ्य शरीर और मन, दोनों का संतुलन है।

क्या रोग न होना ही स्वस्थ होना है?
नहीं। आयुर्वेद और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), दोनों की दृष्टि में केवल रोग का न होना पर्याप्त नहीं है। अच्छी भूख और पाचन, गहरी नींद, नियमित मल-त्याग, ऊर्जा और प्रसन्न मन भी स्वास्थ्य के ज़रूरी हिस्से हैं।

समदोष का मतलब क्या तीनों दोष बराबर होना है?
नहीं। हर व्यक्ति की जन्मजात प्रकृति अलग होती है — किसी में वात अधिक, किसी में पित्त या कफ। “सम” का अर्थ है दोषों का अपनी प्रकृति के अनुसार संतुलन में रहना, न कि तीनों का गणित की तरह बराबर होना।

घर पर कैसे जानें कि मैं स्वस्थ हूँ या नहीं?
रोज़ के संकेत देखें — समय पर भूख, भोजन का ठीक पचना, सुबह पेट साफ़ होना, गहरी नींद, दिन भर ऊर्जा और मन की प्रसन्नता। फिर भी ये संकेत लैब जाँच या डॉक्टर की जाँच का विकल्प नहीं हैं; ब्लड प्रेशर, शुगर जैसी कई समस्याएँ शुरू में बिना लक्षण के होती हैं।

क्या नाड़ी परीक्षा से स्वास्थ्य की स्थिति समझी जा सकती है?
नाड़ी परीक्षा एक पारंपरिक आयुर्वेदिक समग्र मूल्यांकन पद्धति है, जिसमें वैद्य दोषों, अग्नि और प्रकृति का आकलन करके आहार-विहार का मार्गदर्शन देते हैं। यह लैब टेस्ट या आधुनिक जाँचों का विकल्प नहीं है।

🌿 आज की सबसे महत्वपूर्ण बात

“स्वस्थ वह नहीं जिसे कोई रोग नहीं — स्वस्थ वह है जो अपनी प्रकृति में संतुलित और मन से प्रसन्न है।”

याद रखने का सरल सूत्र —

⚖️ दोष — अपनी प्रकृति के अनुसार संतुलन
🔥 अग्नि — समय पर भूख, ठीक पाचन
🧬 धातु — उम्र के अनुसार बल और पोषण
🚿 मल — रोज़ नियमित और साफ़
👁️ इन्द्रियाँ — सक्षम और ताज़ा
😊 मन — शांत, संतुष्ट, प्रसन्न

🔔 कल सुबह पढ़िए — अंक 005

🌿 नाड़ी विज्ञान क्या है? इतिहास और परंपरा

कलाई की नाड़ी देखने की विद्या कहाँ से आई, किन ग्रंथों में मिलती है और गुरु-शिष्य परंपरा में कैसे जीवित रही।

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यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है। किसी भी रोग या दवा के लिए योग्य चिकित्सक से परामर्श लें।

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