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अंक 009अष्टविध परीक्षा क्या है? आयुर्वेद की आठ परीक्षाएँ और नाड़ी पहले क्यों
✍ नाड़ी वैद्य डॉ. अजीत सिंह यादव · 📅 04 November 2026
🌿 आयुर्वेद ज्ञानमाला — नाड़ी वैद्य के संग | अंक 009
वैद्य रोगी को आठ द्वारों से परखते हैं — नाड़ी से आकृति तक, और हर द्वार शरीर की एक कहानी कहता है
लेखक: नाड़ी वैद्य डॉ. अजीत सिंह यादव (BAMS) • सह-लेखक: नाड़ी वैद्य डॉ. सलोनी यादव वशिष्ठ (BAMS, MD (DN)), नाड़ी वैद्य डॉ. मोहित वशिष्ठ (BAMS, MD (AM))
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अष्टविध परीक्षा आयुर्वेद में रोगी को परखने की आठ परीक्षाओं का समूह है — नाड़ी, मूत्र, मल, जिह्वा (जीभ), शब्द (आवाज़), स्पर्श (त्वचा का स्पर्श), दृक् (आँखें) और आकृति (शरीर की बनावट)। इन आठों को मिलाकर वैद्य यह समझने का प्रयास करते हैं कि शरीर में कौन-सा दोष बढ़ा है, अग्नि कैसी है और शरीर में “आम” तो नहीं जमा।
बचपन में जब हम बीमार पड़ते थे, तो घर के बड़े सबसे पहले क्या करते थे? माथे पर हाथ रखकर बुख़ार देखते, “ज़रा जीभ दिखाओ” कहते, आँखों में झाँकते और पूछते — “पेट साफ़ हुआ?” गाँव के वैद्य जी भी आते ही कलाई थामते और फिर चेहरे, आवाज़ और चाल पर नज़र डालते। यह घरेलू समझ असल में अष्टविध परीक्षा का ही सरल रूप है, जो पीढ़ियों से हमारे घरों में चलती आई है।
कल अंक 008 में हमने देखा कि थाली के पाँच तत्व कैसे शरीर बनते हैं। आज जानते हैं कि वैद्य शरीर के भीतर का हाल बाहर से किन आठ खिड़कियों से पढ़ते हैं।
🌿 आज का स्वास्थ्य सूत्र
“शरीर बोलता है — नाड़ी में, जीभ में, आँखों में। सुनना सीखिए।”
योगरत्नाकर में अष्टविध परीक्षा का प्रसिद्ध सूत्र है —
“रोगाक्रान्तशरीरस्य स्थानान्यष्टौ परीक्षयेत्।
नाडीं मूत्रं मलं जिह्वां शब्दं स्पर्शं दृगाकृती॥”
भावार्थ: रोग से ग्रस्त शरीर के आठ स्थानों की परीक्षा करनी चाहिए — नाड़ी, मूत्र, मल, जिह्वा, शब्द, स्पर्श, दृक् (नेत्र) और आकृति। ध्यान दीजिए — सूची में नाड़ी सबसे पहले है।
1. आयुर्वेद क्या कहता है — परीक्षा पहले, उपचार बाद में
आयुर्वेद का मूल सिद्धांत है कि उपचार से पहले रोगी को समझो, केवल रोग को नहीं। चरक संहिता में रोगी की दस प्रकार से परीक्षा (दशविध परीक्षा — प्रकृति, विकृति, सार, संहनन, प्रमाण, सात्म्य, सत्व, आहार-शक्ति, व्यायाम-शक्ति, वय) बताई गई है, और साथ में दर्शन, स्पर्शन, प्रश्न जैसी विधियाँ भी।
बाद के काल में वैद्यों ने रोज़ के अभ्यास के लिए एक सरल, तेज़ और व्यावहारिक क्रम बनाया — अष्टविध परीक्षा। यह योगरत्नाकर जैसे ग्रंथों में मिलती है और आज भी आयुर्वेदिक ओपीडी में रोगी को परखने का आधार है। आठों परीक्षाएँ मिलकर एक ही सवाल का जवाब ढूँढती हैं: वात, पित्त, कफ में से कौन बढ़ा या घटा है, और अग्नि-आम की स्थिति क्या है?
2. आठ परीक्षाएँ — एक-एक करके
- 1️⃣ नाड़ी परीक्षा: कलाई पर तीन उँगलियों से नाड़ी की गति, लय, बल, गहराई और तापमान का अनुभव। वात की नाड़ी को परंपरा में साँप जैसी, पित्त की मेंढक जैसी उछलती और कफ की हंस जैसी धीमी-स्थिर कहा गया है।
- 2️⃣ मूत्र परीक्षा: मूत्र का रंग, मात्रा, गंध, झाग और साफ़पन। परंपरा में “तैल-बिंदु परीक्षा” भी वर्णित है — मूत्र पर तेल की बूँद डालकर उसके फैलने का ढंग देखना।
- 3️⃣ मल परीक्षा: मल कड़ा है या ढीला, रंग, गंध और नियमितता। आयुर्वेद में माना गया है कि “आम” युक्त मल भारी, चिपचिपा और दुर्गंधयुक्त होता है।
- 4️⃣ जिह्वा परीक्षा: जीभ का रंग, नमी, दरारें और ऊपर की परत। मोटी सफ़ेद परत को प्रायः “साम” (आम सहित) अवस्था का संकेत माना जाता है।
- 5️⃣ शब्द परीक्षा: आवाज़ की स्पष्टता, भारीपन या रूखापन; साथ में साँस, खाँसी और पेट की आवाज़ें।
- 6️⃣ स्पर्श परीक्षा: त्वचा का तापमान, रूखापन या चिकनाई, पसीना, सूजन और दर्द वाले स्थान।
- 7️⃣ दृक् (नेत्र) परीक्षा: आँखों का रंग, लाली, पीलापन, चमक, रूखापन और पानी आना।
- 8️⃣ आकृति परीक्षा: शरीर की बनावट, कद-काठी, चाल, चेहरे का भाव और समग्र रूप — इससे प्रकृति और बल का अनुमान।
3. तीन दोष, आठ परीक्षाएँ — आम संकेत
ग्रंथों और अनुभवी वैद्यों के अनुसार हर दोष आठों द्वारों पर अपनी छाप छोड़ता है। नीचे की तालिका केवल समझने के लिए सामान्य संकेत है:
| परीक्षा | 🌬️ वात | 🔥 पित्त | 🌿 कफ |
|---|---|---|---|
| नाड़ी | तेज़, अनियमित, पतली (सर्प गति) | उछलती, तीव्र, गरम (मंडूक गति) | धीमी, स्थिर, भारी (हंस गति) |
| मूत्र | हल्का, कम, कुछ रूखा-सा | गहरा पीला, जलन | सफ़ेद-सा, झागदार, गाढ़ा |
| मल | कड़ा, सूखा, कब्ज़ | ढीला, पीला, बार-बार | चिकना, भारी, चिपचिपा |
| जिह्वा | रूखी, दरारें | लाल, गरम, पीली परत | गीली, मोटी सफ़ेद परत |
| शब्द | रूखी, टूटती, तेज़ बोलना | तीखी, स्पष्ट, तर्कपूर्ण | भारी, मधुर, धीमी |
| स्पर्श | ठंडी, रूखी त्वचा | गरम, पसीने वाली | ठंडी, चिकनी, नम |
| दृक् | रूखी, चंचल | लालिमा, पीलापन, तीव्र | सफ़ेद, चिकनी, शांत |
| आकृति | दुबला, पतली हड्डियाँ | मध्यम, सुगठित | भारी, मज़बूत, सुडौल |
एक संकेत से निष्कर्ष नहीं निकलता। वैद्य आठों परीक्षाओं, रोगी के प्रश्नों के उत्तर और प्रकृति को मिलाकर ही निर्णय करते हैं।
4. नाड़ी पहले क्यों?
श्लोक में नाड़ी को पहला स्थान मिलना संयोग नहीं है। परंपरा में इसके कुछ कारण बताए जाते हैं:
- पूरे शरीर का दर्पण: नाड़ी में हृदय की धड़कन से जुड़ा रक्त-प्रवाह पूरे शरीर से होकर आता है, इसलिए अनुभवी वैद्य इसमें तीनों दोषों का संयुक्त चित्र पढ़ते हैं।
- तुरंत उपलब्ध: मूत्र-मल की परीक्षा हर समय संभव नहीं, पर नाड़ी कभी भी देखी जा सकती है।
- सूक्ष्म बदलाव पकड़ना: रोग के लक्षण बाहर आने से पहले भी नाड़ी की लय और बल में बदलाव महसूस हो सकता है — ऐसा अनुभवी वैद्य मानते हैं।
- बाक़ी सात की दिशा: नाड़ी से मिला संकेत बताता है कि आगे किस परीक्षा पर अधिक ध्यान देना है।
नाड़ी विज्ञान के इतिहास और ग्रंथों के बारे में अंक 005 — नाड़ी विज्ञान क्या है? में विस्तार से पढ़ें।
5. आधुनिक विज्ञान क्या कहता है?
रोचक बात यह है कि आधुनिक चिकित्सा में भी डॉक्टर सबसे पहले “जनरल फ़िज़िकल एग्ज़ामिनेशन” करते हैं — पल्स गिनना, जीभ देखना, आँखों में पीलापन (पीलिया) या सफ़ेदी (ख़ून की कमी) देखना, त्वचा छूकर बुख़ार और नमी जाँचना, आवाज़ और साँस सुनना। मूत्र और मल की लैब जाँच भी आज की चिकित्सा का बड़ा आधार है।
अंतर तरीक़े का है: आधुनिक चिकित्सा इन संकेतों को मापने (नंबर, रिपोर्ट) पर ज़ोर देती है, जबकि अष्टविध परीक्षा इन्हें दोष, अग्नि और प्रकृति की भाषा में पढ़ती है। दोनों दृष्टियाँ एक-दूसरे की पूरक हो सकती हैं। ध्यान रहे — अष्टविध परीक्षा लैब टेस्ट, एक्स-रे या स्कैन का विकल्प नहीं है।
6. सात प्रकृतियाँ — आठ परीक्षाओं में क्या झलकता है?
| प्रकृति | सामान्य स्वस्थ अवस्था में झलक | किस बदलाव पर ध्यान दें |
|---|---|---|
| 🌬️ वात | दुबली काया, तेज़ आवाज़, त्वचा कुछ रूखी | कब्ज़, जीभ में दरारें, नींद कम होना |
| 🔥 पित्त | गरम हथेलियाँ, तीखी आँखें, स्पष्ट वाणी | मूत्र में जलन, आँखों में लाली, ढीला मल |
| 🌿 कफ | सुडौल शरीर, मधुर आवाज़, चिकनी त्वचा | जीभ पर मोटी परत, भारीपन, आलस्य |
| 🌬️🔥 वात-पित्त | मध्यम-दुबली काया, फुर्ती | रूखापन के साथ जलन |
| 🔥🌿 पित्त-कफ | मज़बूत शरीर, अच्छी भूख | चिकनी-गरम त्वचा, भारीपन व अम्लता |
| 🌬️🌿 वात-कफ | ठंड के प्रति संवेदनशील | ठंडी त्वचा, जकड़न, जीभ पर परत |
| 🌬️🔥🌿 सम प्रकृति | संतुलित संकेत, नियमित पाचन | किसी भी एक दिशा में लगातार बदलाव |
अपनी प्रकृति इस तालिका से स्वयं तय न करें — प्रकृति का निर्णय योग्य वैद्य ही परीक्षा करके करते हैं।
7. किन्हें विशेष सावधानी रखनी चाहिए?
- स्वयं-निदान न करें: जीभ या मूत्र का रंग देखकर अपने-आप रोग तय करना और दवा लेना ठीक नहीं
- तुरंत डॉक्टर के पास जाएँ अगर: मूत्र में ख़ून, काला या ख़ून वाला मल, आँखों-त्वचा में पीलापन, तेज़ बुख़ार, साँस फूलना, सीने में दर्द, अचानक आवाज़ बैठना जो ठीक न हो, या अचानक वज़न घटना
- डायबिटीज़, किडनी, लिवर या हृदय रोग वाले: अपनी नियमित जाँचें और दवाएँ डॉक्टर की सलाह से जारी रखें
- गर्भवती महिलाएँ, छोटे बच्चे और बुज़ुर्ग: किसी भी असामान्य बदलाव पर जल्दी योग्य चिकित्सक को दिखाएँ
- कुछ दवाएँ, विटामिन और खाद्य पदार्थ (जैसे चुकंदर) मूत्र-मल का रंग बदल सकते हैं — घबराने से पहले यह भी सोचें
8. इस ऋतु में — हेमंत में आठ परीक्षाएँ क्या कहती हैं?
शुरुआती सर्दी (हेमंत) में ठंडी-रूखी हवा का असर आठों द्वारों पर दिखता है: स्पर्श में त्वचा रूखी, होंठ फटे; जिह्वा कुछ सूखी; प्यास कम लगने से मूत्र गाढ़ा पीला; और कम पानी व रूखे भोजन से मल कड़ा। यह मौसम का सामान्य प्रभाव हो सकता है, रोग नहीं।
इसलिए गुनगुना पानी थोड़ा-थोड़ा पीते रहें, तेल मालिश करें और गरम, ताज़ा, स्निग्ध भोजन लें। ऋतु के अनुसार आहार के लिए अंक 006 — सर्दियों में क्या खाएँ? पढ़ें।
🩺 9. नाड़ी परीक्षा — आठ द्वारों का पहला द्वार
नाड़ी परीक्षा में वैद्य तीन उँगलियों से नाड़ी की गति • लय • बल • गहराई • तापमान को अनुभव करते हैं, फिर बाक़ी सात परीक्षाओं से उस अनुभव को पुष्ट करते हैं। यही अष्टविध परीक्षा की असली शक्ति है — कोई एक संकेत नहीं, आठों का मेल।
नाड़ी वैद्य डॉ. अजीत सिंह यादव जी के 36+ वर्षों के क्लीनिकल अनुभव में नाड़ी परीक्षा हर परामर्श की शुरुआत रही है। नाड़ी वैद्य परिवार को फ़िल्म जगत, रॉयल फ़ैमिलीज़, प्रमुख बिज़नेस फ़ैमिलीज़ और अंतरराष्ट्रीय रोगियों के साथ परामर्श का अनुभव है, और नाड़ी वैद्य गुरुकुल से प्रशिक्षित नाड़ी वैद्य आज देश के लगभग हर राज्य में सेवा दे रहे हैं।
“नाड़ी को केवल छूना नहीं — नाड़ी से जुड़ना पड़ता है।”
नाड़ी परीक्षा की मूल बातें अंक 002 में पढ़ें, और यह विद्या स्वयं सीखना चाहें तो देखें — नाड़ी परीक्षा कोर्स।
नाड़ी परीक्षा एक पारंपरिक आयुर्वेदिक समग्र मूल्यांकन पद्धति है; यह लैब टेस्ट या आधुनिक जाँचों का विकल्प नहीं है।
🏡 10. आज का Practical Experiment — सात दिन, अपने शरीर को पढ़िए
- दिन 1 — जिह्वा: सुबह उठते ही, कुछ खाने-पीने से पहले, आईने में जीभ देखें — रंग, परत, नमी लिखें
- दिन 2 — मूत्र: दिन भर में पानी कितना पिया और मूत्र का रंग कैसा रहा — दोनों लिखें
- दिन 3 — मल: पेट किस समय साफ़ हुआ, आसानी से या ज़ोर लगाकर — लिखें
- दिन 4 — स्पर्श: सुबह और रात हथेलियाँ-पैर छूकर देखें — ठंडे, गरम, रूखे या नम?
- दिन 5 — दृक्: आँखों में रूखापन, लाली या भारीपन — नींद के घंटों के साथ मिलाएँ
- दिन 6 — शब्द: सुबह और शाम आपकी आवाज़ में फ़र्क़ — भारी, साफ़ या थकी?
- दिन 7 — मनन: सात दिन की डायरी देखें — भोजन, नींद और मौसम का आपके संकेतों पर क्या असर दिखा?
यह अभ्यास निदान नहीं, केवल आत्म-निरीक्षण है। कोई असामान्य लक्षण दिखे तो योग्य वैद्य या डॉक्टर से परामर्श लें।
पिछले अंक पढ़ें: अंक 008 — पंचमहाभूत शरीर और भोजन में • अंक 005 — नाड़ी विज्ञान क्या है? • अंक 002 — नाड़ी परीक्षा क्या है?
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
अष्टविध परीक्षा में कौन-सी आठ परीक्षाएँ होती हैं?
नाड़ी, मूत्र, मल, जिह्वा (जीभ), शब्द (आवाज़), स्पर्श (त्वचा), दृक् (आँखें) और आकृति (शरीर की बनावट)। यह क्रम योगरत्नाकर के प्रसिद्ध श्लोक में मिलता है।
अष्टविध परीक्षा में नाड़ी को पहले क्यों रखा गया है?
परंपरा में नाड़ी को पूरे शरीर की स्थिति का दर्पण माना गया है — इसे कभी भी देखा जा सकता है और यह बाक़ी परीक्षाओं की दिशा तय करती है। पर निर्णय आठों परीक्षाओं को मिलाकर ही होता है।
क्या मैं घर पर अपनी अष्टविध परीक्षा कर सकता हूँ?
जीभ, मूत्र, मल, त्वचा जैसे संकेतों पर ध्यान देना आत्म-जागरूकता के लिए अच्छा है। पर इनसे स्वयं रोग तय करना या दवा लेना ठीक नहीं — निदान योग्य वैद्य या डॉक्टर ही करें।
दशविध और अष्टविध परीक्षा में क्या अंतर है?
दशविध परीक्षा (चरक संहिता) रोगी की प्रकृति, सार, बल, आयु, सात्म्य जैसे दस पहलुओं का गहन मूल्यांकन है। अष्टविध परीक्षा आठ शारीरिक संकेतों की सरल, व्यावहारिक परीक्षा है, जो रोज़ के क्लीनिकल अभ्यास में तेज़ी से की जाती है।
क्या अष्टविध परीक्षा लैब टेस्ट की जगह ले सकती है?
नहीं। यह पारंपरिक समग्र मूल्यांकन है, जो व्यक्ति की प्रकृति और दोषों की स्थिति समझने में मदद करता है; लैब टेस्ट, एक्स-रे या स्कैन का विकल्प नहीं है। नाड़ी परीक्षा सीखना चाहें तो नाड़ी परीक्षा कोर्स देखें।
🌿 आज की सबसे महत्वपूर्ण बात
“एक संकेत अनुमान है, आठ संकेत समझ हैं — और उस समझ की पहली सीढ़ी नाड़ी है।”
याद रखने का सरल सूत्र —
🩺 नाड़ी — गति, लय, बल
💧 मूत्र — रंग, मात्रा
🚽 मल — कड़ा, ढीला, नियमित
👅 जिह्वा — रंग, परत
🗣️ शब्द — आवाज़, साँस
✋ स्पर्श — ठंडा, गरम, रूखा
👁️ दृक् — आँखों का रंग, चमक
🧍 आकृति — बनावट, चाल
⚠️ सावधानी — स्वयं-निदान नहीं, योग्य वैद्य/डॉक्टर से परामर्श
🔔 कल सुबह पढ़िए — अंक 010
💧 खाली पेट गर्म पानी पीने के फायदे — सच और सावधानी
सुबह गुनगुना पानी किसके लिए अच्छा, किसके लिए नहीं, कितना गरम और कब — आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों की नज़र से।
🪷 नाड़ी परीक्षा स्वयं सीखिए
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यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है। किसी भी रोग या दवा के लिए योग्य चिकित्सक से परामर्श लें।
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